Saturday, 30 October 2010

प्रेम




प्रेम
दिल किसी का न टूटे दुआ कीजीये,
बनके राधा के मोहन रहा कीजीये /
प्रेम की बासुरी गर बजाये कोई,
प्रेमधुन में उसी के रमा कीजीये //

प्रेम अनमोल है इसकी कीमत नहीं,
धर्म और धन में इसको तो मत तोलिये /
जिन्दगी चार दिन की जियो प्रेम से,
नफरतो का जहर तो है मत घोलिये //

प्रेम तो है इबादत उस ईश की,
प्रेम रस में हमेशा गमन कीजीये /
तुमको मिल जाये कोई दिवाना कभी,
उसकी दीवानगी को नमन कीजीये //

इस धरा पर है चहु ओर संकट बहुत,
प्रेम के हर सुमन से चमन कीजीये /
मिलन हो जाये सबका जरुरी नही,
दूर ही दूर से प्रेम है कीजीये//

(उपरोक्त कविता "हिंदी गौरव", आस्ट्रेलिया से प्रकाशित)



2 comments:

बालकिशन said...

उर्त्कष जी आप प्रेम कविता उत्तम है कुछ सामाजिक लेख भी प्रकाशित करेँ

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही खुबसूरत ख्यालो से रची रचना......