अर्जुन पुराण
मौन न रहो, हे अर्जुन!
माया-मोह का बंधन तजकर, अब तो तुझे बोलना होगा,
सारे जग के सम्मुख अब तो, सारा रहस्य खोलना होगा,
नोटों और वोटों के माफिक, प्राणों का मोल तोलना होगा,
कर्म मार्ग पर चलकर तुझको, मोक्ष का द्वार खोलना होगा
मौन न रहो, हे अर्जुन!
तुम तो अर्जुन थे, फिर दुर्योधन का चोला क्यों ओढा था,
लाशों के ढेर लगाने वालों से, रिश्ता क्यों जोड़ा था,
जिस जनता के रक्षक थे, उसके भक्षक को क्यों छोड़ा था,
इस महाभारत में भी दिल्ली ने, कर्त्तव्यों से मुख क्यों मोड़ा था॥
मौन न रहो, हे अर्जुन!
शकुनी तो परदेशी था, पर ध्रतराष्ट्र-दुशाशन कौन बना था ,
भारत का लहू बहाने में, किसका किसका हाथ सना था ,
भीष्म पितामह सा भारत का, संविधान क्यों पंगु बना था,
धर्म-ज्ञान की शिक्षा देता, ऐसा न कोई कृष्ण जना था
मौन न रहो, हे अर्जुन!
अभिमन्यु यदि मरता तेरा,तब भी तुम ऐसा ही करते,
हत्यारे के चरणों में तुम,अपना मस्तक यूँ ही धरते,
वृहन्नला बन जाते अर्जुन,पर यूँ न दुर्योधन बनते,
सत्ता के चक्कर में पड़कर, इतने प्राणों को न हरते ॥
मौन न रहो, हे अर्जुन!
गांधारी सी अंधी होकर, अब सत्ता क्यों है मौन खड़ी,
चुनाव हो गया द्युतक्रीडा,क्यों सबको अपनी जीत पडी,
निज स्वार्थो के चक्रव्युह में,क्यों सारी व्यवस्था है जकडी,
अबला है भारत की जनता,क्यों चीरहरण हो घडी-घडी

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