मात्-पिता, मातृ-भूमि, मातृ-भाषा, जीवन नैया की मेरी खेवन हार है,
इनके चरणों में जीवन निछावर मेरा, यही उत्कर्ष का पहला प्यार है।
इनके आँचल में ही मै फूला-फला, मेरा जीवन तो इनका कर्जदार है,
इनकी सेवा जीवन भर करता रहू, ये ही चाहत मेरी बारम्बार है॥
बृजेन्द्र श्रीवास्तव 'उत्कर्ष'
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